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सोमवार, 18 मार्च 2013

छेड़खानी व् गुंडागर्दी करने वाले परिसर में भय मुक्त घूम रहे है लेकिन इसका विरोध करने वालों को गिरफ्तार किया जाता है :

  

     गत 24 जनवरी को बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में सुबह आइसा के एक कार्यकर्ता को बिरला क्षात्रावास में रह रहे अभाविप के कुछ गुंडों द्वारा पिटा गया।
बीसीएम की तरफ से बतौर प्रतिनिधि शैलेश और अजय  लंका थाने  गए और ऍफ़आईआर दर्ज  करवाया गया उसी दिन शाम बिरला से गुज़र रही छात्राओं पर परिसर में तथाकथित समाजवादी ''समाजवादी छात्र सभा''से जुड़े कुछ गुंडों (सुजीत सिंह ''मेजर '',शेखर सिंह ,मृत्युंजय )ने अश्लील फ़ब्तिया कसी और उनके साथ छेड़खानी की उसके बाद बहादुर लडकियों ने पलटकर जवाब दिया।
हिंदी विभाग पहुचकर  इनके खिलाफ नारे लगाते हुए धरने पर बैठ गयी और इनके निष्कासन की मांग करने लगी। फिर ये गुंडे वहाँ पहुच कर उनको गन्दी-गन्दी गालियाँ दिए ,धमकी दिए इसके बाद प्रशासन भी उनके ऊपर लाठियां बरसाना सुरु कर दिया।तब छात्र-छात्राए वहाँ से बचते हुए वि सी आवास की तरफ बढ़ने लगे वहाँ पर भी पुलिस बैरिकेड लगाए हुए तैनात थी।
बावजूद इसके  बैरिकेड तोड़कर छात्र-छात्राएं वीसी आवास के सामने संगठित हो गए और गुंडों एवं प्रशासन के खलाफ नारे लगाते हुए धरने पर बैठ गए वे मांग कर रहे थे की गुंडों को गिरफ्तार किया जाए और उनको निष्कासित किया जाए ,वीसी बाहर निकले अपनी छात्राओ की समस्याए सुने।
     


 हद तो तब हो गयी जब गुंडे वहा पर भी आ धमके अश्लील इशारे करते गालियाँ देने लगे और धरने को हटाने का पूरा प्रयास किये और बीसीएम के सचिव रितेश विद्यार्थी को धमकी भी दी गई वही   प्रशासन के डेढ़ सौ से अधिक जवान होने के बावजूद उन्हें कुछ नहीं किया गया बल्कि उनको कहते  शांत हो  जाओ कुछ नहीं होगा। उल्टे  छात्राओ  को मर्यादा में रहने की हिदायत देते हैं मामला साफ़ है इनकी सत्ता है प्रशासन की सह पर गुंडे ऐसा कर पा रहे है पांच घंटे तक धरने पर बैठे छात्राओं से  वीसी मिलने नहीं आये तब पांच छात्राए मिलने के लिए गयी और  केवल आश्वासन देकर भेज दिया गया तब जाकर साढ़े  सात बजे धरना समाप्त हुआ।
इसी मामलें को लेकर  बीसीएम ने निर्णय लिया की ३० जनवरी को विश्वविद्यालय परिसर में छेड़खानी व् गुंडागर्दी के खिलाफ एवं परिसर को भय मुक्त बनाने के लिए छात्र-छात्राओं एवं बुद्धिजीवियों का संकल्प मार्च किया जायेगा।
उसी सिलसिले में पुरे कैम्पस में पोस्टर लगाए  गए और पर्चे भी बांटे गए चीफ प्राक्टर के घूम-घूम कर पोस्टर फाड़ने पर दोबारा पोस्टर लगाएं गए। लेकिन जैसे ही बीसीएम के कार्यकर्त्ता निकलने के लिए हिंदी विभाग चौराहे पर अपने बैनर और तक्थियाँ लेकर पहुचते है उन्हें आधुनिक और लोकतान्त्रिक मूल्यों के केंद्र में और गाँधी के शहादत दिवस के दिन पुलिस और प्रोक्टोरियल बोर्ड के जवान गिरफ्तार करके बर्बरता पूर्वक पुलिस वेंन  में ठूस दिया गया।
गिरफ्तार होने वालों में संगठन के सचिव रितेश विद्यार्थी ,सुनील कुमार ,अरुण ,उज्जवल शामिल थे। छेड़खानी व् गुंडागर्दी करने वाले परिसर में भय मुक्त घूम रहे है लेकिन इसका विरोध करने वालों को गिरफ्तार किया जाता है भगत सिंह छात्र मोर्चा के नेताओं की गिरफ़्तारी के बाद पूरा परिसर उबल पड़ा। विभिन्न संगठनो ने इस गिरफ़्तारी को परिसर में लोकतंत्र की ह्त्या और गुंडा तत्वों को संरक्षण देने वाला कदम बताते हुए मुख्य द्वार बीएचयू  से मार्च निकाला , लंका थाने का घेराव किया और धरना दिया। 
 थाना प्रभारी के कहने पर की तुम्हारे साथी रिहा हो गए और इसकी पुष्टि हो जाने पर देर शाम धरना समाप्त हुआ जिसमें बीसीएम ,अनुसूचित जाति - जनजाति छात्र संगठन ,अईसा ,एसऍफ़आई  संगठन शामिल थे।
अभी तक दोसियों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई।

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रेट एग्जम्टेड की सीटो पर आरक्षित श्रेणी का कोटा लागू कराने के लिए किये गए संघर्ष की एक रिपोर्ट :


गत 16 नवम्बर , दिन शुक्रवार को नेट व् जे आर ऍफ़  क्वालीफाई कर चुके sc-st-obc वर्ग के छात्र -छात्राए bhu के हिंदी विभाग  में उस वक्त धरने पर बैठ गए जब उन्हें पता चला की रेट एग्जम्टेड  की सितो पर आरक्षित वर्ग के लिए  कोटा लागू नहीं किया गया है। पहले तो विभागाध्यक्ष  प्रो .बलराज पांडे से मिलकर यह निवेदन किया की सभी 38 सितो जिन पर सामान्य भर्ती  की गयी है उन पर अरक्षित श्रेणी के लिए कोटा लागु किया जाये। लेकिन प्रो . बलराज पांडे ने कोटा लागु करने से यह कह कर इंकार कर दिया की यु जी सी  से जो निर्देश आये  है उनके तहत रेट एग्जम्तेद की सितो पर कोटा देने का कोइ प्रावधान नहीं है। इसके बाद भगत सिंह छात्र मोर्चा और अनुसूचित जाति -जन जाति छात्र संगठन के सयुंक्त  नेत्रित्व में आरक्षित श्रेणी के छात्र-छात्राए हिंदी विभाग के सामने ही धरने पर बैठ गए। लगभग दो घंटे तक धरनारत छात्रो द्वारा नारेबाजी करने के बाद अपनी किरकिरी होते देख विभागाध्यक्ष प्रो . बलराज पांडे , प्रो .अवधेश प्रधान सहित अन्य सिक्षाको के साथ धरना दे रहे छात्रो के पास आये। पहले तो इन लोगो ने धरनारत छात्र -छात्राओ को समझाने-बुझाने की कोशिश की लेकिन छात्र-छात्राओ द्वारा कड़ा प्रतिवाद करने पर अंततः इन्हें झुकना पड़ा और यह कहना पड़ा की कल sc-st-obc आरक्षित सीटो पर कोटा दिया जायेगा और संशोधित सूचि निकली जायेगी। अगले दिन संशोधित सूचि निकली गयी जिसमे सीटे 38 से बढाकर 62 कर दी गयी ताकि पहले द्वारा सामान्य वर्ग के चुने गए छात्रो को बहार न निकलना पड़े।
अब सवाल यह उठता है की एक दिन में ये अतिरिक्त साईट कहा से आ गयी ? sc-st वर्ग की कुछ छात्राओ को जो जे आर ऍफ़ क्वालीफाई  है और फ़ोर  फर्स्ट क्लास भी हैउन्हें सेलेक्ट नहीं किया गया जबकि यु जी सी का ये निर्देश है की जे आर ऍफ़ को पहले वरीयता दी जायेगी। इन छात्राओ द्वारा इंटरव्यू और सेलेक्शन में पारदर्शिता न होने का आरोप लगाने पर विभाग के कुछ सिक्षाको और कर्मचारियों द्वारा यहाँ तक  कहा गया की जे आर ऍफ़ निकालने से क्या होता है ,जाओ जाकर घास गढ़ो।
धरने पर बैठी छात्राएं और छात्र
तमाम छात्र -छात्राओं का यह आरोप है की इंटरव्यू में बड़े पैमाने पर मनमानी की गयी है न केवल sc-st-obc बल्कि सामान्य वर्ग के छात्रो के साथ भी नाईन्शाफी  हुई है . बहुत से छात्र -छात्राओं द्वारा यह आरोप लगाया गया की इंटरव्यू में उनकी जाती पूछी गयी st वर्ग की एक छात्रा ममता ने जो की काफी गरीब घर से आती है और काफी मेहनत करके अपनी पढाई जारी राखी हुई  है आरक्षित वर्ग के लिए कोटा न लागू होने की वजह से  दुखी होकर विभागाध्यक्ष को आत्मदाह की  लिखित धमकी दी। यह कहना आशान है की आत्मदाह की धमकी देना गलत है ,इससे गलत सन्देश जाएगा , यह कमजोरी का परिचायक है लेकिन उस छात्रा का दर्द महसूस करना कठिन है जो बेरोजगारी और तंगहाली के इस दौर में एक गरीब ,दलित परिवार की होकर भी यहाँ तक पहुची है। यहाँ तक कहा गया की ''सेलेक्सन से क्या होता है गाईड तयं करेगा किसको लेना है और किसको नहीं। विश्वविद्यालय उच्चतर ज्ञान उत्पादन  का केंद्र होता है , हम अयोग्य लोगों को रिसर्च नहीं करायेंगे छाहे वो किसी वर्ग के हो।अयोग्य लोग   m.a.पास कर लिए है इतना ही काफी है। '' आरक्षण के लिए संघर्ष के पीछे यही विचार था किकम्जोर वर्ग के छात्रो को थोडा अतिरिक्त अवसर देकर उन्हें उच्च शिक्षा व् नौकरियों तक पहुचाया जा सके ताकि शिक्षा ,संस्कृति व् अन्य छेत्रो में वो भी अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व कर सके/
स्वाभाविक है आरक्षित श्रेणी में प्रवेश पाए छात्र अन्य छात्रो की अपेक्षा थोड़े कमजोर होंगे ही और इसके एतिहासिक कारण भी है ऐसे में यदि सभी तेज -तर्रार छात्रो को आप रिसर्च करायेंगे तो थोड़े कमजोर छात्रो का क्या होगा ? सामाजिक न्याय की संकल्पना का क्या होगा ?
इस वर्ष पुरे विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने वाले छात्रो के साथ बड़े पैमाने पर नाईन्शाफी व् मनमानी की गयी है। लेकिन हिंदी विभाग जो बी एच यूं  . में वामपंथी मूल्यों व् विचारो का केंद्र समझा जाता है , जहां इतने बड़े पैमाने पर कवी ,कहानीकार .,व् आलोचक रहते है वहां अपने ही समाज के दबे -कुचले वर्ग के छात्र-छात्राओं के साथ अन्याय काफी निराश करता है और यह स्पस्ट करता है की ब्राम्हणवादी मूल्य इन तथाकथित वामपंथी शिक्षको के भीतर गहराई से घुसी हुई है।
अब सवाल उठता है की प्रो . बलराज पांडे और प्रो .अवधेश प्रधान जैसे वरिष्ठ शिक्षक जो जन-संस्कृति मंच से भी जुड़े हुए है  क्या उनकी इतनी नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती थी की यदि आरक्षित श्रेणी को कोटा देने का निर्देश ऊपर से नहीं भी आया हो तो वो अपनी तरफ से कोशिश  करे और सम्बंधित अधिकारियो से बात करके इनका कोटा लागू  करवाए।
आखिर दो घंटे के धरने में ये कोटा कहाँ से आ गया ?,बढ़कर 62 कैसे हो गयी ?
नाईन्शाफी तो इस व्यवस्था के बुनियाद में ही है और आरक्षण भी वैसे ही है जैसे भीड़ में कुछ सिक्के उछाल कर फेक दिए जाए।