मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

हंस पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव को भावभीनी श्रद्धांजली !

हिंदी साहित्य के प्रख्यात साहित्यकार , हंस  पत्रिका के संपादक तथा हिंदी साहित्य के स्तम्भ माने जाने वाले राजेंद्र यादव जी का गत सोमवार  निधन हो गया । 
मशाल सांस्कृतिक मंच उनको श्रद्धांजली  अर्पित करता है ।  


राजेंद्र यादव से हमारी उम्मीदें हमेशा बनी रहीं: वरवर राव



राजेंद्र यादव को क्रांतिकारी कवि वरवर राव की श्रद्धांजली

लगभग 30 साल से चले आ रहे हमारे बीच के संवाद को राजेंद्र यादव ने मेरे नाम एक लंबा पत्र लिखकर हमेशा के लिए बंद कर दिया। मैंने उन्हें जवाब दिया था और पिछले दिनों हुए विवाद और बहस में अपने दो पत्रों से अपनी अवस्थिति को सभी के सामने रखा भी था। इसके बाद उन्होंने मुझे एक लंबा पत्र लिखा और ‘हंस’ में संपादकीय भी लिखा। इसे आगामी महीने में ‘अरूणतारा’ में इसका तेलुगू अनुवाद हम प्रस्तुत करेंगे। यह सब इसलिए कि राजेंद्र यादव से हमारी उम्मीदें हमेशा बनी रहीं। हमारे बीच उनका नहीं रहना एक भरी हुई जगह के अचानक ही खाली हो जाने जैसा है, हम सभी के लिए एक क्षति है।

1980 के दशक में जब आंध्र प्रदेश में दमन का अभियान जोरों पर था और सांस्कृतिककर्मी से लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं तक को बख्शा नहीं जा रहा था उस समय की ही बात है राजेंद्र यादव ‘हंस’ को लेकर आए। उसी दौरान उन्होंने पत्र व्यवहार से हमसे संपर्क किया। हमारी कविताएं भी उन्होंने प्रकाशित कीं। राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ को प्रेमचंद की परंपरा और विरासत को आगे ले जाने के वादे और नारे के साथ प्रकाशित किया था। शायद उनकी यही दावेदारी उनको विवाद के घेरे में ले आती रही। उनकी यही दावेदारी मुझे उनसे जोड़ती थी और इसी के तहत विवाद भी बनता रहा।

2002 तक आंध्र प्रदेश में राजकीय दमन अपने घिनौने रूप में सामने आ चुका था और गुंडा-गिरोहों द्वारा सांस्कृतिक, राजनीतिक, सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की खुलेआम हत्याएं की जा रही थीं। मेरे ऊपर पर भी इसी तरह के खतरे थे। मैं थोड़े समय के लिए उस दिल्ली आया। 2002 में ही राजेंद्र यादव से पहली मुलाकात हुई। उनकी तमाम विवादास्पद हरकतों के बावजूद मेरी उनसे एक उम्मीद जो पहले से बनी हुई थी, इस मुलाकात के बाद भी कायम रही। हैदराबाद वापस जाने पर उनसे संपर्क नहीं टूटा। यह उन पर मेरा भरोसा ही था कि पिछले दिनों हुए आयोजन के लिए जो निमंत्रण पत्र भेजा उसमें अन्य वक्ताओं का नाम न होने के बावजूद इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद बने विवाद के बाद मुझे उनके साथ संवाद टूट जाने की उम्मीद नहीं थी और उन्होंने लंबा पत्र लिखा भी।

एक साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी पूरे समाज को प्रभावित करता है। राजेंद्र यादव का नहीं रहना हिंदी साहित्य के साथ साथ पूरे साहित्य जगत की भी क्षति है। साहित्य के मोर्चे पर जीवन के अंतिम क्षण तक लगातार सक्रिय रहने वाले मित्र राजेंद्र यादव को विनम्र श्रद्धांजली और नमन!

नफ़स-नफ़स, क़दम-क़दम




नफ़स-नफ़स, क़दम-क़दम
बस एक फ़िक्र दम-ब-दम
घिरे हैं हम सवाल से, हमें जवाब चाहिए
जवाब दर-सवाल है कि इन्क़लाब चाहिए
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद
ज़िन्दाबाद इन्क़लाब
जहाँ आवाम के खिलाफ साजिशें हों शान से
जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से
वहाँ न चुप रहेंगे हम,कहेंगे हाँ कहेंगे हम
हमारा हक हमारा हक हमें जनाब चाहिए
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद
ज़िन्दाबाद इन्क़लाब 

               रचनाकार: शलभ श्रीराम सिंह

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

निधन / मन्ना डे

Dhruv Gupt



एक दिन सपनों का राही चला जाए सपनों से आगे कहां !


हिंदी फिल्मों की गंभीर और शास्त्रीय आवाज़ 94-वर्षीय मन्ना डे उर्फ़ प्रबोध चन्द्र डे अब नहीं रहे। गंभीर बीमारी के बाद बैंगलोर के एक अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ दिया। मोहम्मद रफ़ी, तलत महमूद, मुकेश और किशोर कुमार के समकालीन मन्नाडे की अपनी शास्त्रीयता और विविधता के कारण फिल्मी गायन में एक अलग पहचान रही थी। लगभग साठ साल लंबे फिल्म कर्रिएर में मन्ना दा ने सैकड़ों कालजयी गीतों को अपना स्वर दिया। जीवन के अंतिम दिनों तक वे गायन के क्षेत्र में सक्रिय थे। उनके गाए कुछ अमर गीत हैं - ऊपर गगन विशाल, दिल का हाल सुने दिलवाला, ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़, न तो कारवां की तलाश है, ऐ मेरे प्यारे वतन ऐ मेरे बिछड़े चमन, तू है मेरा प्रेम देवता, ये रात भींगी भींगी ये मस्त फिजाएं, प्यार हुआ इक़रार हुआ है प्यार से फिर क्यूं डरता है दिल, आजा सनम मधुर चांदनी में हम-तुम, तू छुपी है कहां मैं तड़पता यहां, तू प्यार का सागर है तेरी एक बूंद के प्यासे हम, ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय, सुर ना सजे क्या गाऊं मैं, चलत मुसाफिर मोह लिया रे, आयो कहां से घनश्याम, नदिया चले चले रे धारा, तुम्हें सूरज कहूं या चंदा, पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई, ऐ भाई ज़रा देख के चलो, तुम बिन जीवन कैसे बीता, अब कहां जाएं हम तू बता ऐ ज़मीं, झूमता मौसम मस्त महीना, यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी, ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, कसमें वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या, जीवन से लंबे हैं बंधु इस जीवन के रस्ते, एक चतुर नार करके सिंगार, उमरिया घटती जाए रे, नैन मिले चैन कहां, लागा चुनरी में दाग, किसने चिलमन से मारा नज़ारा मुझे, ऐ मेरी ज़ोहरा ज़बीं, हंसि हंसि पनवा खिअवले बेइमनवा, झनक झनक तोरी बाजे पायलिया आदि। इनकी गंभीर और भावुक आवाज़ में बच्चन जी की 'मधुशाला' सुनना एक अद्वितीय अनुभव है। फिल्म संगीत में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2005 में पद्मभूषण से और 2007 में सर्वोच्च फिल्म सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा है।

मन्ना दा को हमारी अश्रुपूर्ण श्रधांजलि ! वे अपने गीतों और हमारी स्मृतियों में सदा जीवित रहेंगे !

पुण्यतिथि / साहिर लुधियानवी


मैं पल दो पल का शायर हूं पल दो पल मेरी जवानी है !

साहिर लुधियानवी को शब्दों और संवेदनाओं का जादूगर कहा जाता है। वे प्रगतिशील चेतना के ऐसे क्रांतिदर्शी शायर थे जिन्होंने जीवन के यथार्थ और कुरूपताओं से बार-बार टकराने के बावजूद शायरी के बुनियादी स्वभाव - कोमलता और नाज़ुकबयानी का दामन नहीं छोड़ा। ग़ज़लों और नज़्मों की भीड़ में भी उन्हें एकदम अलग से पहचाना जा सकता है। अदब के साथ उन्हें हिंदी / उर्दू सिनेमा के सर्वाधिक लोकप्रिय गीतकार का दर्ज़ा भी हासिल है। ढेरों कालजयी फिल्मों, जैसे - धर्मपुत्र, मुनीम जी, जाल, पेइंग गेस्ट, धूल का फूल, हम हिंदुस्तानी, प्यासा, सोने की चिड़िया, फिर सुबह होगी, ताजमहल, मुझे जीने दो, हम दोनों, बरसात की रात, नया दौर, दिल ही तो है, वक़्त, बहू बेगम, शगुन, लैला मजनू, गुमराह, काजल, चित्रलेखा, हमराज़, दाग, इज्ज़त, कभी कभी आदि के लिए लिखे उनके गीत कभी भुलाये न जा सकेंगे। पुण्यतिथि पर इस महान शायर को खेराज़-ऐ-अक़ीदत , उनकी फिल्म 'साधना ' की एक कालजयी नज़्म के साथ !

औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा दुत्कार दिया

तुलती है कभी दिनारों में, बिकती है कभी बाजारों में
नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में
ये वो बेईज्ज़त चीज़ है जो बंट जाती है इज्ज़तदारों में
औरत ने जनम दिया मर्दों को .....

मर्दों ने बनाई जो रस्में उनको हक़ का फ़रमान कहा
औरत के जिन्दा जलने को कुर्बानी और बलिदान कहा
अस्मत के बदले रोटी दी और उसको भी एहसान कहा
औरत ने जनम दिया मर्दों को .....

मर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवां औरत के लिए रोना भी ख़ता
मर्दों के लिए लाखों सेज़ें औरत के लिए बस एक चिता
मर्दों के लिए हर ऐश का हक़ औरत के लिए जीना भी सज़ा
औरत ने जनम दिया मर्दों को .....

औरत संसार की क़िस्मत है फ़िर भी तक़दीर की हेठी है
अवतार पयम्बर जनती है फ़िर भी शैतान की बेटी है
ये वह बदक़िस्मत मां है जो बेटों की सेज़ पे लेटी है
औरत ने जनम दिया मर्दों को .....
— with Sahitya Akademi.
 
 
Photo: पुण्यतिथि / साहिर लुधियानवी 
मैं पल दो पल का शायर हूं पल दो पल मेरी जवानी है !

साहिर लुधियानवी को शब्दों और संवेदनाओं का जादूगर कहा जाता है। वे प्रगतिशील चेतना के ऐसे क्रांतिदर्शी शायर थे जिन्होंने जीवन के यथार्थ और कुरूपताओं से बार-बार टकराने के बावजूद शायरी के बुनियादी स्वभाव - कोमलता और नाज़ुकबयानी का दामन नहीं छोड़ा। ग़ज़लों और नज़्मों की भीड़ में भी उन्हें एकदम अलग से पहचाना जा सकता है। अदब के साथ उन्हें हिंदी / उर्दू सिनेमा के सर्वाधिक लोकप्रिय गीतकार का दर्ज़ा भी हासिल है। ढेरों कालजयी फिल्मों, जैसे - धर्मपुत्र, मुनीम जी, जाल, पेइंग गेस्ट, धूल का फूल, हम हिंदुस्तानी, प्यासा, सोने की चिड़िया, फिर सुबह होगी, ताजमहल, मुझे जीने दो, हम दोनों, बरसात की रात, नया दौर, दिल ही तो है, वक़्त, बहू बेगम, शगुन, लैला मजनू, गुमराह, काजल, चित्रलेखा, हमराज़, दाग, इज्ज़त, कभी कभी आदि के लिए लिखे उनके गीत कभी भुलाये न जा सकेंगे। पुण्यतिथि पर इस महान शायर को खेराज़-ऐ-अक़ीदत , उनकी फिल्म 'साधना ' की एक कालजयी नज़्म के साथ !

औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया 
जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा दुत्कार दिया 

तुलती है कभी दिनारों में, बिकती है कभी बाजारों में 
नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में 
ये वो बेईज्ज़त चीज़ है जो बंट जाती है इज्ज़तदारों में 
औरत ने जनम दिया मर्दों को .....

मर्दों ने बनाई जो रस्में उनको हक़ का फ़रमान कहा 
औरत के जिन्दा जलने को कुर्बानी और बलिदान कहा 
अस्मत के बदले रोटी दी और उसको भी एहसान कहा 
औरत ने जनम दिया मर्दों को .....

मर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवां औरत के लिए रोना भी ख़ता 
मर्दों के लिए लाखों सेज़ें औरत के लिए बस एक चिता 
मर्दों के लिए हर ऐश का हक़ औरत के लिए जीना भी सज़ा 
औरत ने जनम दिया मर्दों को .....

औरत संसार की क़िस्मत है फ़िर भी तक़दीर की हेठी है 
अवतार पयम्बर जनती है फ़िर भी शैतान की बेटी है 
ये वह बदक़िस्मत मां है जो बेटों की सेज़ पे लेटी है
औरत ने जनम दिया मर्दों को .....

कविता


 'समझदारों का गीत' 
 
हवा का रुख कैसा है, हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं, हम समझते हैं
हम समझते हैं खून का मतलब
पैसे की कीमत हम समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है, हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं
चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच-समझ कर बोलते हैं हम
हम बोलने की आजादी का
मतलब समझते हैं
टुटपुँजिया नौकरी के लिए
आजादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरोजगारी अन्याय से
तेज दर से बढ़ रही है
हम आजादी और बेरोजगारी दोनों के
खतरे समझते हैं
हम खतरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्यों बच जाते हैं, यह भी हम समझते हैं।
हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह
सिर्फ कल्पना नहीं है
हम सरकार से दुखी रहते हैं
कि समझती क्यों नहीं
हम जनता से दुखी रहते हैं
कि भेड़ियाधँसान होती है
हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी
हम समझते हैं
यहाँ विरोध ही बाजिब कदम है
हम समझते हैं
हम कदम-कदम पर समझौते करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिए तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क गोल-मटोल भाषा में
पेश करते हैं, हम समझते हैं
हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी
समझते हैं
वैसे हम अपने को किसी से कम
नहीं समझते हैं
हर स्याह को सफे़द और
सफेद को स्याह कर सकते हैं
हम चाय की प्यालियों में
तूफान खड़ा कर सकते हैं
करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमजोर हो
और जनता समझदार
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं

हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं
यह भी हम समझते हैं।
_______________________गोरख पाण्डेय  

रविवार, 21 जुलाई 2013

संस्कृतिकर्मियों पर दमन बंद करो !



मशाल सांस्कृतिक मंच एवं भगतसिंह छात्र मोर्चा के द्वारा ( ३१ जुलाई ) प्रेमचंद्र जयंती के उपलक्ष में गीत , नुक्कड़ नाटक और सभा का आयोजन किया गया | जिसके तहत विभिन्न जगहों पर रिहर्सल किया जा रहा है | उसी कड़ी में दिनांक १५ जुलाई २०१३ को बिहार ,जिला :वैशाली के लालगंज क्षेत्र में कार्यक्रम प्रस्तुत  किया गया |
उसके बाद दिनांक १६ जुलाई २०१३ को २ बजे से मजदूर किसान सभा के नेतृत्व में जिला :पूर्वी चम्पारन ,मोतिहारी प्रखंड के देवाकुलिया चौक पर गीत एवं नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति कर रहे थे, तभी वहाँ पर  सीआरपीएफ. की कोबरा बटालियन ,एसटीऍफ़ ,एवं स्थानीय पुलिस से भरी चार गाड़ी आ पहुची और चारो तरफ से हम लोंगों को  घेर लिया गया |
         हथियारों के साथ पोजीसन ले लिए ,हमारे कार्यक्रम को रोक दिया गया, गाली-गलौज करने लगे |  देवकुलिया  चौक को दिन भर के लिए नाकेबंदी कर दी गयी और सभी गाड़ियों की तलासी ली जाने लगी | हम लोगों से पूछताछ करने लगे की तुम लोग कौन हो?,यहाँ क्या करने आये हो?,किसने बुलाया है?,क्या उद्देश्य है?,और कहा की तुम लोग माओवादी हो | हम लोंगों ने बताया की हम मशाल सांस्कृतिक मंच  बीएचयू. से है ,३१ जुलाई प्रेमचंद्र की जयंती के अवसर पर विभिन्न जगहों पर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया है, हम सब  बीएचयू. के छात्र है |आई डी.कार्ड भी दिखाए ,उसके बाद हमारे बैगों की तलासी ली गयी | कुछ भी बरामद न होने पर हमें फेनहरा थाने ले जाया गया|
     जिसमे मजदूर किसान सभा: के सम्राट अशोक ,हरेन्द्र तिवारी ,अवतार सिंह कुशवाहा ,पत्रकार :संजय कुमार( तलाश पत्रिका ), मशाल सांस्कृतिक मंच: के जन गायक युद्धेश  "बेमिशाल" ,रितेश विद्यार्थी ,संतोष ,नमो नारायण ,रोहित ,शैलेश कुमार. और महिला विकास मंच: की ममता देवी ,आदि लोग थे |
    थाने में  एएसपी :संजय कुमार सिंह के नेतृत्व में थानाध्यक्ष: देवेन्द्र कुमार पाण्डेय , एसटीऍफ़ ,सीआरपीऍफ़ की कोबरा बटालियन द्वारा हमसे पूछताछ की : पैसे कहा से मिलते है? ,यहाँ क्या करने आये थे ?,किसने बुलाया था ? हमारे साथ घंटो पूछताछ ,गाली-गलौज और  डंडे लात-घुसे से मारा  -पीटा गया , टार्चर किया गया , तथा कोबरा बटालियन के कमान्डेंट ने मुर्गा बनाकर कमर पर डंडे से मारा |
  वहाँ से रात 8 बजे चार गाड़ी कोबरा बटालियन के साथ मुफस्सिल थाने  में हम लोंगों से सेलफोन, बैग एवं सारे सामानों को जब्त कर लिया गया और फिर मोतिहारी थाने ले जाया गया और जेल में बंद कर दिया गया ,रात में खाना -पानी तक भी नहीं दिया गया तथा लैट्रीन बाथरूम पर भी पाबन्दी लगा दी गयी | विभिन जन संगठनो ,पत्रकारों एवं बुद्धिजीवियों आदि द्वारा दबाव बनाए जाने पर अगले दिन दिनांक : १७ जुलाई २०१३ को ३ बजे जब हमारे ऊपर कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ तो उन्हें हमें छोड़ना  पड़ा |


(   मोतिहारी के स्थानीय अखबार की खबर   )
   उत्तरी बिहार के पूरे ईलाके वैशाली ,पूर्वी चम्पारन ,मुजफ्फरपुर ,हाजीपुर को सीआरपीएफ ,पुलिस द्वारा गरीब ,पिछडों को माओवादी घोषित कर  किसी को भी उग्रवादी ,माओवादी कह कर उठा ले जाती है | वहां की जनता में भय का माहौल है और जनता सीआरपीएफ ,पुलिसिया दमन से त्रस्त है ,वहां पर कोई भी छोटे-बड़े   इस  तरह के कार्यक्रम भी नहीं करने दिया जाता है| सीआरपीएफ के सामने पुलिस की कुछ भी नहीं चलती है सब कुछ सीआरपीएफ के निर्देश पर थाने की मदद से होता है |

गुरुवार, 20 जून 2013

यादों में फड़फड़ाता है लाल माथे पर एक नीला रिबन



दलित, अल्पसंख्यक बस्तियों से गुजरती हुई नीले परों वाली एक लाल चिड़िया की याद आती है आज के दिन. सुनसान सड़कों पर उभरते जुलूस की शक्ल और तनी हुई मुट्ठियों का कोरस याद आता है. नजरों में फिर जाती है राजधानियों की कत्लगाहों की बेचारगियां और हवा में कारतूस की गंध. यादों में फड़फड़ाता है लाल माथे पर एक नीला रिबन.

विलास घोगरे. आप जानते हैं उन्हें.

आज से पंद्रह साल पहले मुंबई में भूमिहीन दलित, आदिवासी जनता के क्रांतिकारी गायक विलास घोगरे ने आत्महत्या कर ली थी. घोगरे ने भारतीय समाज के अर्धसामंती और अर्धऔपनिवेशिक शोषण में पिसते किसान मजदूर जनता के दुखों की कहानी ही नहीं कही, उसके बहादुराना संघर्ष की बेमिसाल दास्तान भी गाई है. और इस तरह गाई है कि इनको अलग-अलग नहीं किया जा सकता. घोगरे के यहां जहां भी दुख है, तकलीफ है, पीड़ा है, शोषण और उत्पीड़न है, वहां इसके खिलाफ संघर्ष भी है, निरंतर संघर्ष, राजनीतिक और कांतिकारी संघर्ष. वे शोषण और उत्पीड़न को बनाए रखने की एक प्रणाली के रूप में संसद और संसदीय चुनावों के अंतर्निहित जनविरोधी चरित्र को समझते हैं और इसको ध्वस्त करके समाज के क्रांतिकारी रूपांतरण का आह्वान करते हैं. वे सत्ता पर दलितों, आदिवासियों, भूमिहीन किसानों और मजदूरों का अधिकार चाहते हैं. घोगरे आह्वान से जुड़े हुए थे और उनका व्यापक सांस्कृतिक-राजनीतिक जुड़ाव गदर के नेतृत्व में चले सांस्कृतिक आंदोलन तथा देश के दूसरे इलाकों के क्रांतिकारी सांस्कृतिक परंपराओं से था. उन्होंने चुनाव और संसद के फंदे में जा फंसे बेईमान वामपंथी दलों के असली चरित्र को भी जनता के सामने रखा.

1997 में 11 जुलाई को जब मुंबई के घाटकोपर में दलितों-मुसलिमों की बस्ती रमाबाई नगर में बाबा साहेब की प्रतिमा का अपमान किए जाने के खिलाफ आक्रोशित दलितों पर पुलिस ने फायरिंग की और दस से अधिक लोग शहीद हुए, तो उसी बस्ती में रहने और राजनीतिक काम करने वाले घोगरे इस वेदना को बरदाश्त नहीं कर पाए. उन्होंने 15 जुलाई को आत्महत्या कर ली.

यहां उनको याद करते हुए उनके कुछ मशहूर गीत प्रस्तुत हैं. घोगरे को आज के समय में याद करने का मतलब उन सारे संस्कृतिकर्मियों, लेखकों, पत्रकारों की हिमायत में उठ खड़े होना है, जो घोगरे की जनपक्षधर क्रांतिकारी गतिविधियों के राजनीतिक हमसफर हैं. घोगरे को याद करने का मतलब सुधीर ढवले, सीमा आजाद, विश्वविजय, अभिज्ञान सरकार, देबोलीना, कबीर कला मंच के साथियों, उत्पल और दूसरे दर्जनों कार्यकर्ताओं की हिमायत में अपनी आवाज बुलंद करना है, जो दलित, आदिवासी जनता के संघर्षों का साथ देने और सत्ता प्रतिष्ठानों का विरोध करने की वजह से अलग-अलग जगहों पर जेलों में बंद हैं.

हाल ही में फिल्मकार आनंद पटवर्धन ने जय भीम कॉमरेड  के नाम से एक लंबी फिल्म बनाई है, जो विलास घोगरे को याद करते हुए, उनको केंद्र में रखते हुए भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक दलित आंदोलनों के विभिन्न आयामों का जायजा लेती है. इसे जरूर देखा जाना चाहिए. डीवीडी के रूप में यह फिल्म उपलब्ध है और इसे हासिल करने के तरीके के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें. घोगरे को याद करते हुए हेई पी. न्यूटन द्वारा क्रांतिकारी आत्महत्या  पर लिखा गया यह लेख भी पढ़ें.


ये आजादी झूठी है


ये आजादी झूठी है

ये आजादी झूठी है

लुटेरों की चांदी है

ये आजादी झूठी है

लुटेरों की चांदी है

साथियो लूट को मिटाना है

साथियो जुल्म को मिटाना है

रोटी है तो सब्जी नहीं

सब्जी है तो रोटी नहीं

शेर नन्हे – मुन्ने भी भूख से तड़पते हैं

साथियो पास कोई सिक्का नहीं

साथियो रोने को भी कोई आस नहीं

ये आजादी झूठी है

लुटेरों की चांदी है

कभी भी आराम नहीं

मेहनत का दाम नहीं

रात दिन उगाते हो मिट्टी से सोना तुम

साथियो खाने को दाना एक मुट्ठी नहीं

साथियो जीवनभर छुट्टी नहीं

ये आजादी झूठी है

लुटेरों की चांदी है

नाले सब साफ किये

जिंदगी अछूत हुई

ये सफेदपोश हुए

तेरी उम्र धूल हुई

साथियो नाली तेरी गंगा है

साथियो झोपड़ी हैं शीशमहल

ये आजादी झूठी है

लुटेरों की चांदी है

बच्चा बीमार पड़ा है

लेके अस्पताल चले

कोई नहीं सुनता है घूस दिए, पैर पड़े

घूस लेने को भी कर्जा लिया

साथियो गोली है तो सुई नहीं

साथियो सुई है तो गोली नहीं

ये आजादी झूठी है

लुटेरों की चांदी है

पहली से पढ़ा हुआ लड़का बेकार हुआ

नौकरी तलाशी तो दर दर ठोकर खाई

मिनिस्टर के बेटे ने बैठे बिठाई पाई

साथियो पढाई का ऐसा हाल

साथियो बुद्धू हैं मालामाल

आ गया इलेक्शन नेताजी आये हैं

दिल तो पूरा नहीं है

टोपी बदल लाये हैं

तुमसे हाथ जोड़ रहे

हाल चाल पूछ रहे

मीठी मीठी बात करें

वादो से घात करें

साथियो वोट तेरा लूट लिया

साथियो गद्दी पर बैठ गया

ये आजादी झूठी है

लुटेरों की चांदी है

रो रो के जीने से

घुट घुट के मरने से

सिर्फ़ वोट देने से

अपना वोट लेने से

चोरो को उठाने से

मिटता ये जुल्म नहीं

मिटती ये भूख नहीं

साथियो जुल्म अगर मिटाना है

साथियो लूट अगर मिटानी है

साथियो इनकलाब लाना है

साथियो इनकलाब लाना हैं

ये आजादी झूठी है

लुटेरों की चांदी है

ये आजादी झूठी है

लुटेरों की चांदी है

भारत अपनी महान भूमि


भारत अपनी महान भूमि इसकी कहानी सुनो रे भाई

भारत अपनी महान भूमि

इसकी कहानी सुनो रे भाई

सर पे खड़ा है बड़ा हिमालय

नदिया बहती गंगा, जमुना,

ब्रह्मपुत्रा, गोदावरी, कृष्णा

हरीभरी धरती पर अपने

निकले मोती उगले सोना

चीजों से भंडार भरा है

अनाज से गोदाम भरा है

पर घर मैं मेहमान आये तो

साथ उसी के भूखा सोना

आर्ररेरेरेरेरे रा रा हा

सुजलाम सुफलाम इसी देश में

रोटी महंगी क्यों रे भाई

भारत अपनी महान भूमि

इसकी कहानी सुनो रे भाई

रुपये में जब अस्सी पैसा

खेती पे करते हैं भरोसा

खेती का पानी पे है भरोसा

पानी का बादल पे भरोसा

और गंगाजल पे है भरोसा

बैल, खाद और नहर की चाबी

सभी बड़ों के हाथ में आयी

आर्ररेरेरेरेरे रा रा हा

खेती प्रमुख इस भारत भू में

किसान भूखा क्यों रे भाई

खेती प्रमुख इस भारत भू में

किसान भूखा क्यों रे भाई

कोठे में जलती है बिजली,

तुम्हें बताऊं कैसे निकली

मजदूर के नसलों से भाई

लंबी चौड़ी तार बनाई

मसल से पलक बनाया

पलकों पे बलब बनाया

बटन दबाओ करो उजाला

मजदूर झेले खून की ज्वाला

आर्ररेरेरेरेरे रा रा हा

जग को उजाला देनेवाला

अंधेरे में क्यों रे भाई

जग को उजाला देनेवाला

अंधेरे में क्यों रे भाई

यहां गाय की होती पूजा

कुत्ते को घर का दरवाजा

बिल्ली को चूल्हे तक आजा

गोमूत्र को पवित्र समझे

गोबर से आंगन को सजाता

मानव बनाये चप्पल जूता

गोबर उठाता, गाय चराता

धार निकाले गाय भैंस की

दूध निकाले पीने देता

वही पीये और जाये अखाड़ा

हिन्द केसरी भी कहलाता

आर्ररेरेरेरेरे रा रा हा

मानव को जो उठाये

वो अछूत कैसा रे भाई

मानव को जो उठाये

वो अछूत कैसा रे भाई

यहां की नारी बनी देवता

सती सावित्री राम की सीता

यहां की नारी बनी देवता

सती सावित्री राम की सीता

रानी अहिल्या हिम्मत वाली

रानी लक्ष्मी झांसी वाली

कोई कहेगा दिल्ली वाली

इंद्र की इस कर्मभूमि पर

इंद्र की इस धर्मभूमि पर

नारी पे क्या क्या ना गुजरी

आर्ररेरेरेरेरे रा रा हा

बच्चों की रोटी के वास्ते

शरीर बेचे क्यों रे भाई

बच्चों की रोटी के वास्ते

शरीर बेचे क्यों रे भाई

ऐसे अपनी कर्मभूमि के

लीडर कैसे कैसे देखो

हिन्दुराष्ट्र के अटल बिहारी

किसानपुत्र चरण चौधरी

साथ में इनके मोरारजीभाई

लाखों रुपये का चुनाव लड़कर

जगजीवन बने दलित लीडर

तेलगू देस का एनटीआर तो

कॉसमीशन में प्रभु बना है

नाग की कुन्डी बनाकर

इनकम टैक्स दबा बैठा है

ये साले सब सफेद हाथी

गुन्डा मवाली इनके साथी

ये गरिबों की क्या सोचेंगे

इसने कभी ना मेहनत देखी

शेर हिरण को मार ही देगा

कसाई बकरा नही छोड़ेगा

जबकि लीडर शेर कसाई

हम बकरों को क्या छोड़ेगा

आर्ररेरेरेरेरे रा रा हा

छुपा हुआ शैतान मिलेगा इनकी टोपी में रे भाई

राज गरीब का लानेवाले

इनकलाब चिल्लाने वाले

सीपीएम के ज्योति बसु

राजा बना घूमता फिरता है

मार्क्सवाद का खून करें वो

मार्क्सवाद कहते रे भाई

सर्वहारा के नाम पे सारे

मालदार बन गये रे भाई

जमीन के लिए लड़ने वाले

बन्धू अपने नक्सल भाई

हाथों में हथियार थमा दिया रे

आर्ररेरेरेरेरे रा रा हा

कांग्रेस की सरकार यहां पर

सारा वक्त सत्ता के बराबर

गरीबी हटाओ का नारा लगाकर

गरीब को लुटा है बराबर

एशियाड में रुपया गंवाया

और जनता पर टैक्स चढ़ाया

बढ़ी अमीरी बढ़ी गरीबी

टाटा, बिरला खूब कमाया

जमीन के लिए लड़ने वाले

बन्धू अपने नक्सल भाई

हाथों में हथियार थमा दिया रे

आर्ररेरेरेरेरे रा रा हा

अरे शैतानों को मिली आजादी

हमें किया बरबाद रे भाई

अरे शैतानों को मिली आजादी

हमें किया बरबाद रे भाई

दुनिया के बाजार में भाई

रशिया अमरीका बड़े सेठ हैं

युद्धसामग्री बनानेवाले

छोटे देश को लड़ानेवाले

खुद ही आपस मैं लड़ मरते हैं

अपना देश दोनों के हाथ में

राजु, राज उनके ही साथ में

जो भी था रशिया ले गया

बाकी बचा अमरीका खा गया

जमीन के लिए लड़ने वाले

बन्धू अपने नक्सल भाई

हाथों में हथियार थमा दिया रे

आर्ररेरेरेरेरे रा रा हा

हमारे लिए छोड़ दिया है

नंगा भूखा भारत भाई

हमारे लिए छोड़ दिया है

नंगा भूखा भारत भाई

ये है कहानी मेरी तुम्हारी

नहीं किसी की बनी बनाई

सदियों से सुना है हरा रंग भरा

अबके हाथ में आया है मौका

अबकी लोहा लाल हुआ है

जोरदार ही लगा दो ठोका

पाना है मजदूर मुक्ति को

रोकना है शोषण शक्ति को

मजदूर के शासन के वास्ते

अब तो जागना पड़ेगा भाई

मजदूर के शासन के वास्ते

हाथ में हथियार होना भाई

हाथ में हथियार होना भाई

हाथ में हथियार होना भाई

(गदर के मूल तेलुगू गीत का हिंदी रूपांतरण विलास घोगरे ने किया था)

हिसाब कर ले


क्या खोया क्या पाया जिंदगी में हिसाब कर ले

क्या खोया क्या पाया जिंदगी में

हिसाब कर ले

क्या खोया क्या पाया जिंदगी में

हिसाब कर ले

जनम मिला है दु:ख में

जीना – मरना भी दु:ख में

जनम मिला है दु:ख में

जीना – मरना भी दु:ख में

क्यों ना सुख को अपनाया जिंदगी में

हिसाब कर ले

क्या खोया क्या पाया जिंदगी में

हिसाब कर ले

दुनिया की हर चीज बनाई तूने

दुनिया की रौनक बढ़ाई तूने

सदियों से खून पसीना बहाकर

दुनिया की ठोकर खाई तूने

मेहनत करके रोटी को तरसा है तू

मेहनत करके रोटी को तरसा है तू

नंगे फकीर की दुनिया में अरसा है तू

जो तेरी मेहनत पे रहता है शीश महल में

जो तेरी मेहनत पे रहता है शीश महल में

क्यों ना अब तक ठुकराया जिंदगी में

हिसाब कर ले

क्या खोया क्या पाया जिंदगी में

हिसाब कर ले

कल का दिन तेरा है यकीनन है

पर फसा है तू आपस के झगड़े में

वरना विजय तुझको मुमकिन है

लाल झंडे तले तुझे आना होगा

इनकलाब का गीत भी गाना होगा

इतिहास में पता है

मजदूर ही पिता है

अब की खुद को फर्माया जिंदगी में

हिसाब कर ले

क्या खोया क्या पाया जिंदगी में

हिसाब कर ले

क्या खोया क्या पाया जिंदगी में

हिसाब कर ले

जनम मिला है दु:ख में

जीना – मरना भी दु:ख में

जनम मिला है दु:ख में

जीना – मरना भी दु:ख में

क्यों ना सुख को अपनाया जिंदगी में

हिसाब कर ले।

एक कथा सुनो रे लोगो  

आनंद पटवर्धन की फिल्म मुंबई हमारा शहर का अंश जिसके लिए घोगरे ने यह गीत गाया था
साभार - हाशिया ब्लॉग